Tuesday, August 19, 2008

Pearls of wisdom - In conversation with Gulzar Ji (14 August 2008)

My friend Anagha is doing a project on 'Waterproof Mumbai'. I am making a documentary on it. On 14th Aug.2008, we stood outside Gulzar ji's bunglow 'Boskiana' (Bosky is his daughter Meghna's nickname) waiting to ring the bell...we looked at each other and realised our journey on the project had begun.

We went in.
We looked around the living room. A 'floor to ceiling' framed photograph of Meghna (when she was 3-4 yrs old) reminded me of my Dad. We could see the adjoining study full of books, writings, papers and a window letting in the afternoon sun. We didn't dare venture there. We confined our exploration to the living room. Various statues of Buddha and his own caricatures filled the room.

Waited a bit. Despite our shy 'no no'...two cool glasses of green sherbet came in. Just as we started sipping...Gulzar ji walked in...apologizing profusely for being late. We stood up. In complete awe, we had no idea how to tell him 'it was perfectly all right...in fact we didn't mind waiting at all'.

As we got on with our work, all awkwardness vanished. Anagha was at her best as she explained the project to him. He recited 3 of his poems based on 'Mumbai in rains'. It was an experience to hear him recite & explain the nuances.

We had some time at our hand as we were setting and lighting up for his interview. For a moment there was silence and all three stopped talking at the same time.

I have no idea what possessed me. I blurted out 'मेरी बहुत सालों से इच्छा है के मैं आपको अपनी एक कविता सुनाऊँ. I said it and had absolutely no idea why I did so coz it had been years since I wrote and there was no way I would remember them by heart. One of those silly things you do on impulse and regret it soon after. He asked me to sit and recite. I smiled back and did as I was told. I started with a poem that had no name and nine verses. I should have chosen a small one. He wouldn't have had to suffer much.

I finished and sat still. Looking at Gulzar ji like I look at Dad at dining table after serving him overcooked chapatis and yet hoping to hear 'wah kya khana banaya hai meri beti ne'....
Now followed the biggest compliment of all (or maybe he was just being nice)...'तो क्या आपकी नज्मों की किताब छपी है या किसी magazine में publish होती हैं?'
I didn't know where to look. Just smiled and said 'नहीं, सिर्फ diary में हैं'.
He said 'अरे आपको भेजनी चाहियें magazines में. Reject हो जाने के डर से भेजना बंद नहीं करना चाहिए. मेरे ख्याल में तो जितनी बार reject हों वो अच्छा ही है क्योंकि इसका मतलब कम से कम editor ने पढ़ीं तो होंगीं'.

I said 'मैंने सुनाई हैं कुछ लोगों को पर जब देखा के उन्हें समझ ही नहीं आईं तो फिर बंद कर दिया सुनाना'.

He said ' इतनी मेहनत तो आपको करनी ही होगी. अगर आप चाहती हैं के आपके काम को कोई पढ़े तो उसे communicate करना आपका काम हैं. ये आपकी ज़िम्मेदारी है के आप लोगों तक पहुंचाए अपना काम, लोगों की नहीं.

I said a sheepish 'जी'.

He said 'जब देनेवाला talent देता है तो आपका फ़र्ज़ है उसे तराशें. आप कुछ साल पहले से अपनी poems मुझे दिखाना चाहती हैं (I had met him earlier on Debeers work) तो तब से आज तक जो आपने लिखा है, क्या आप उस से खुश हैं?

I said 'खुश का तो पता नहीं पर हाँ तब के लिखने और आज के लिखने में फ़र्क काफ़ी है. अच्छा या बुरा हुआ पता नहीं पर आज मैं उस वक़्त जैसा नहीं लिख सकती.

He said 'अच्छा ही है. इसका मतलब है आप grow हो रही हैं. अगर आप उस ही काम को अपना best काम समझें और दूसरी तरह का न करें तो ये complacency होगी. अच्छा या बुरा, आपके काम में हर वक़्त तबदीली आनी चाहिए. एक जीते जागते इन्सान का सबूत है यह. इतने सालों बाद भी मेरी हर नज़्म पर बार-बार काम करता हूँ मैं. कई लोगों को सुनाता हूँ. उनके reactions का ख्याल रखता हूँ और फिर जाकर कहीं ये छपती हैं.

मैंने एक बार लिख दिया....अब जो है सो है.....ऐसा कहना एक writer के लिए arrogance होगा. मैं अपनी पुरानी लिखी चीज़ों को वापस देखता हूँ और सोचता हूँ के ये कैसे बेहतर बन सकती हैं.

Me and Anagha were listening spellbound. I said 'हाँ किसी काम को ख़त्म करते वक़्त पीछे मुड कर देखो तो लगता है 'अरे ये शुरुआत मैंने ऐसे क्यों की...कुछ और करना चाहिए थी'. इस ही वजह से कई बार poems आधी ही रह जाती हैं और लगता है के 'हम कितने fickle minded हैं '.

He said 'पहली बात....कुछ भी लिखते वक़्त अपना दिमाग़ clear रखना चाहिए. ये तो बहुत ही natural है के आपने शुरू किया नहीं और तुकबंदी (rhyming) पहले ही आपके दिमाग़ में आने लगती हैं. इनसे ज़रूर बचना चाहिए क्योंकि फिर ये आपको मजबूर कर देती हैं तुक के हिसाब से लिखने पर. अब 'बारिश' को ही लीजिये...इस topic पर लिखने बैठो तो 'गुज़ारिश', 'सिफारिश', ख्वाहिश' ये सब सूझने लगते हैं.....यहाँ तक के 'खारिश' और 'मालिश' जैसे words भी आ जाते हैं. इनके हिसाब से लिखोगे बेटा, तब तो हो चुकी नज़्म पूरी.
तुकबंदी और अच्छा लिखना ये दो बिलकुल अलग अलग बातें हैं. अच्छा लिखो तो शायद कहीं कहीं अपने आप तुक मिल जाता है पर अगर तुकबंदी करने बैठोगे तो आप कभी अच्छा नहीं लिख पाओगे. हमें consciously इस से बचना चाहिए'.
I said 'हाँ, ऐसा तो होता है लेकिन इन बातों पर मैंने कभी गौर नहीं किया'.

He said 'तो फिर अब करने लगो. मुझे अच्छा लगा जो आपने लिखा है....मैं तो यही चाहूँगा अब ये मैं magazines में पढूं या आपकी किताब में. मेहनत तो है और वो आपको करनी ही होगी अगर आप professionally लिखना चाहती हैं. आसां नहीं है इतना'.

By then the lighting for the shoot was done and all three of us got up at the same time. As he walked into his daughters study to sit for the interview, he turned around and said 'ध्यान रखना मेरी बातों का'.

15 comments:

  1. That was so amazing na Vandu! And you remember every word of his!!!! Thanks a ton for writing this in such a detailed manner! :)

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  2. Yes it was one of those experiences which 'just happens'. I had written it the day I came back from him house....those were golden words...how could I not :)

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  3. too much jealous of u guys!! i met him two times...i crave for it...thanks a lot for uploading it...aur gulzar saab ka hi ek kehna hai....karte ki vidyaa karne se aati hain...keep writin....

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  4. one request...where can we see the documentory...plz let me know!! thank you!!

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  5. thanks yogik...yes it was an honour to meet n interact with him. you can see the project audiovisual at
    http://www.youtube.com/user/volantefilms#p/a/u/0/2oLPsvCID3k

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  6. loved it...he is really amazing...n so affectionate..n down to earth..

    so rightly he said.."
    'जब देनेवाला talent देता है तो आपका फ़र्ज़ है उसे तराशें.'
    इतनी मेहनत तो आपको करनी ही होगी. अगर आप चाहती हैं के आपके काम को कोई पढ़े तो उसे communicate करना आपका काम हैं. ये आपकी ज़िम्मेदारी है के आप लोगों तक पहुंचाए अपना काम, लोगों की नहीं.
    nt going to forget these lines ever...
    thanx for this lovely post

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  7. Hi rashmi :) yes he is absolutely amazing as a creative person. glad you found the post informative and enjoyed reading it. Welcome to Raindrop :)

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    1. रेनड्रोप से ही पारदर्शी विचार और हिदायतें है
      गुलज़ार साहब की...

      informal सा ही लगा तुम्हारा यह ब्लॉग,जहां पहली बार ही आया,
      रश्मि रवीजा जी के references से... ली गई गुलज़ार जी के घर की
      तस्वीर, तस्वीरें गुलज़ार जी और तुम्हारे साथ वाली भी ...
      background and colour combinations of blog page का... एक
      नया-नया सा look और impression दे गया...

      तुकबंदी तो creativity का जंग( rust) है, जिस से बचने की एक आहवान
      सी सलाह दी है गुलज़ार जी ने...तुकबन्दी हमें अच्छा लिखने की मेहनत
      से बचा तो लेती है या जल्दी-जल्दी लिखवा कर हमारा बोजा कम कर देती
      है,पर बाद में हमारे हाथ कुछ भी नही आता सिवाय mediocre लेखन के...

      अपना पूरी मेहनत से लिखा बार-बार संपादक को या पत्रिका में भेजने
      को, या अपना लिखा communicate करने वाली हिदायत गुलज़ार जी
      की गाँठ बाँध लेने जैसी है...यहाँ पर गुलज़ार जी की फरमाबरदारी
      religiously जायज़ लगे...

      ये दो हिदायतें गुलज़ार जी की उनके लिए जो आज लिख रहे हैं, नए या
      पुराने दोनो ही, के लिए एक राजमार्ग सी है...

      closely classic and useful interview - thanks !

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  8. आपका बहुत बहुत स्वागत है रेनड्रॉप पर, शेख़ साहब. आपने कितनी गहराई से सोचा है उनकी दी हुई हिदायतों के बारे में और उसे भी ज्यादा खूबसूरती से उन्हें व्यक्त भी किया है. सच में गाँठ बाँध लेने वाली हैं उनकी एक एक बात. ख़ुशकिस्मती है मेरी जो उनके सामने बैठ कर ये सब बातें सुनाने को मिलीं. एक लेखिका के लिए तो जीवन का एक 'कभी न भुला सकनेवाला' क्षण है वो. धन्यवाद.

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    1. Vandana ji ka likha kuchh aur padhne ki ichchha bani rahegi...

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  9. जी ज़रूर. आप इस ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं...
    http://mydolchi.blogspot.in/

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  10. मुलाकात को इतने ब्यौरे के साथ साझा किया वंदना। पढ़ कर अच्छा लगा और कुछ सीख भी मिली। बहुत छोटी लगने वाली बातें ही लोगों को बड़ा बनाती हैं।

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  11. मुलाकात को इतने ब्यौरे के साथ साझा किया वंदना। पढ़ कर अच्छा लगा और कुछ सीख भी मिली। बहुत छोटी लगने वाली बातें ही लोगों को बड़ा बनाती हैं।

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  12. Anuradha, you are right...aur kabhi kabhi aisa bhi hota hai ke bade logon ki chhoti chhoti baatein bhi haein badi lagne lagti hain :) perception ka khel hai bas. I liked your poems so much.

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Thanks for stopping by :)